Sunday, September 8, 2019

हैदराबाद की गणेशोत्सव

संस्कृति के कथानकों और कथाओं को जीवंत करते ये कलाकार और उनकी भाव भंगिमाएं , ढोलको की high pitched थाप और मृदंग की गूंज सारे शरीर में एक अजीब सी सकरात्मक आवेश (charge) और ऊर्जा की कम्पन पैदा करती है, पर इसके साथ भौंडे और अश्लील नृत्य / थिरकन मन को उद्वेलित भी करती है । 





क्यों कला और संस्कृति के किसी विधा को अश्लीलता और उच्छृंखलता के सहारे की जरूरत पड़ रही है? या फिर हमने इस अश्लीलता और उच्छृंखलता को अपनी जरूरत बना ली है ? और क्या, कला को भला किसी के सहारे की क्या जरूरत आन पड़ी ! 





आज उत्तर भारत के त्योहारों में भी यही हावी है - पूजा पण्डालों और विसर्जनों में बॉलीवुड के नंबर- सॉन्ग्स ही पहली और अंतिम पसंद रह गई है। 

खैर छोड़िए - जब तक मन उन ढोलकों के थाप , दुर्गा, काली और शिव के ताण्डव - नृत्य में खोया था , मन शांत था । एक प्रश्न जरूर था कि मेरे भीतर की बुराइयों के विनाश के लिए दुर्गा और काली कब आएगी । कहीं दूर से अभी भी आ रही है वो थाप । विशाल है अपना यह देश, विशाल है अपनी संस्कृति । 

   


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Saturday, June 22, 2019

मेरी दादी की डाँट

आज Whatsapp पर एक मेसेज आया था -- 
हमारी दादी नानी की अनपढ़ पीढ़ी जो हम सबको बहुत डाँटती थी , कहती थी “नल धीरे खोलो... पानी बदला लेता है! अन्न नाली में न जाए, नाली का कीड़ा बनोगे! सुबह-सुबह तुलसी पर जल चढाओ, बरगद पूजो, पीपल पूजो, आँवला पूजो, मुंडेर पर चिड़िया के लिए पानी रखा कि नहीं? हरी सब्जी के छिलके गाय के लिए अलग बाल्टी में डालो। जाओ ये रोटी गली वाले कुत्ते को दे आओ ।" .......... 
मेरे मन में यही विचार आया - "वो अनपढ़ होकर भी ज्ञानी थीं , और मैं विज्ञानी होकर भी अज्ञानी रह गया ।" इन सब को ना मानने का काफी मजबूत हथियार था हमारे पास - ये सब ढकोसला है , अंधविस्वास है । माना कि पीपल पूजना अंधविश्वास था उनका, विज्ञान नही पता था उन्हें की पीपल ऑक्सीजन की खान है । पर मैंने ये कैसा विज्ञान पढ़ा जिसने ये नही सिखाया की पीपल काटना कितना खतरनाक होगा । काश मैंने भी विज्ञान ना पढ़ा होता - खाने में प्लास्टिक और खतरनाक जहर तो ना मिलाया होता । पेडों को समाप्त कर गर्मी को इस खतरनाक स्तर तक तो ना पहुँचाया होता । पानी के स्तर को इस स्तर तक तो ना पहुँचा दिया होता । काश मैंने भी विज्ञान ना पढ़ा होता ।
 
मुझे खुद से जुड़ी एक प्रसंग याद आ गयी । कोई आज से 20 साल पहले मुझे मेरी दादी ने ख़तरनाक वाली डाँट लगाई थी -
"हथवा में भुर है एखनी के , जेतना के खा है ना कि ओतना तो गिरावा है ।..... bla bla .. " 
एक लंबा सा भाषण । मुझे सारा चुन-चुन कर उठा कर खाना पड़ा | मैं आज उनके भाषण के साथ उनके दिल की टीस ( अन्न के अपमान के कारण ) को महसूस कर सकता हूँ । ये टीस हो भी क्यों ना , बीज बोने से लेकर अनाज काटने और फिर पकाने तक के आठ महीने का सारा मेहनत तो उनका खुद का था । 
आज की माँओं को भी फर्क नही पड़ता क्योंकि ready to eat packets से 5-10 मिनट में भोजन तैयार । 
उत्पादन में लगने वाला मेहनत का अंदाज भी नहीं है , सिर्फ पैसों की क़ीमत पता है । 
आज की पढ़ाई ये सिखाती है - नीचे गिरा हुआ अन्न गंदा हो गया, उसे मत खाओ। क्या हो गया संत तिरुवल्लुवर की पानी से भरी कटोरी और सुई?  हम ये क्यों नहीं सिखाते की नीचे गिराना गलत है !

Sunday, June 16, 2019

Happy fathers day Papa

A lot of Gratitude Papa Jee🙏🙏 
What am I today is only because of you - Your discipline, your trust, your teaching, your attitude towards money & articles, your inclination towards spirituality. 

You have always inspired me as being an all-time learner. I am always proud of you.


Sunday, May 26, 2019

माँ - बाप के निर्णय

यह हर पिता चाहता है कि सन्तान उनके आज और भविष्य के निर्णय में साझीदार बने ! लेकिन यह क्या ! वह तो उनके भूतकाल के निर्णय को भी अपने भौतिक लाभ - हानि के तराजू पर तोलकर उन निर्णयों पर प्रश्न चिन्ह लगाने लगा है ! जब वो था भी नही, उस समय के निर्णय को भी उसने सही और गलत का दर्जा दे दिया है , वो भी दूसरे के सामने ही नहीं अपने दिल में भी । उसे तो पता भी नही है की यह सारा निर्णय भी तो इसी के लिए था, पर पता करने की कोशिश भी कहाँ की ! और यदि कोशिश कर भी लेता तो भला पता कर कैसे पाता ! कैसे उन अनुभवो को समझ पाता जो उस पिता के दिल में था, कौन उसे बता पाता, शायद वो पिता भी अब उन अनुभवों को हु-ब-हु नहीं बता पाएगा । उसे तो स्वयं बाप होना होगा - उस अनुभव को जीने के लिए ! जब बीस वर्षों बाद उसके सन्तान उसके निर्णयों पर विश्लेषण कर रहे होंगे तब शायद वो आज के दिनों को फिर से याद कर पाएगा ।

Friday, September 7, 2018

शिक्षा व्यवस्था के उत्पाद


जब भारत के सबसे बेहतर दिमाग वाले ( सामाजिक स्तर पर प्रमाणित और स्वीकृत ) अब suicide करने को मजबूर हो रहे हैं तो क्या हमें अब अपनी इस शिक्षा व्यवस्था और उससे भी अधिक इस शिक्षा व्यवस्था के उत्पाद पर प्रश्न नहीं उठाना चाहिए ? हम समाज के स्तर पर शिक्षा के उत्पाद के रूप में - अच्छी सरकारी नौकरी , अच्छा पैकेज का जॉब चाहते हैं और किसी की प्राप्त शिक्षा की सार्थकता को भी इन्ही बिन्दुओं पर जांच परख कर सिद्ध करते आएँ हैं |





Wednesday, August 15, 2018

स्वतंत्रता का अर्थ

स्वतंत्रता का अर्थ है -- " स्वयं द्वारा नियंत्रित"

पूरे अस्तित्व में हर एक इकाई स्व नियंत्रित है -- चाहे धरती 🌍 हो, सूरज 🌞 हो , चंद्रमा 🌙 हो, जीव जानवर  🐴🐵🐶🐯🐒हों या फिर पेड़ पौधे  🌴🌵🌲🌱🌾 हों । हर एक इकाई अपने निश्चित आचरण के साथ ही जीती है ।

मानव में स्व-नियंत्रण पूर्वक जीना शेष है| 

आज के दिन हम यह शुभ संकल्प लें कि मनमानी से निकल कर स्व-नियंत्रण की स्थिति में आएँ जहा हमारा कोई भी कर्म (कायिक, वाचिक, मानसिक , कृत, कारित,अनुमोदित ) ना तो किसी दूसरे के जीने में हस्तक्षेप न करे और ना ही हमारे कर्म दूसरे से प्रभावित हो । यही हमारे स्वतंत्रता पूर्वक जीने का प्रमाण होगा ।

Happy Independence Day




Thursday, January 5, 2017

रश्मिरथी द्वितीय सर्ग - ऑडियो

और ये द्वितीय सर्ग - 





आपके फीडबैक का इन्तजार |